बाप की औकात

By | April 17, 2021

 

इस बार मायके में बहुत मन लगा। जाने को मन नहीं कर रहा था।
भीगी आँखों से माँ पिताजी ने विदा किया था।

पाँच दिन की छूट्टियाँ बिता कर जब मैं ससुराल पहुँची तो पति घर के सामने स्वागत में खड़े थे।
अंदर प्रवेश किया तो सामने एक चमचमाती गाड़ी खड़ी थी

मैंने आँखों ही आँखों से पति से प्रश्न किया तो उन्होंने गाड़ी की चाबियाँ थमाकर मुस्कुराते हुए बोले –
“कल से तुम इस गाड़ी में कॉलेज जाओगी प्रोफेसर साहिबा!”

“ओह माय गॉड!!” मुझे इतनी ख़ुशी हो रही थी। की मेरे मुँह से और कुछ निकला ही नही।

बस ख़ुशी और भावावेश में मैंने तहसीलदार साहब को एक जोरदार झप्पी दे दी और अमरबेल की तरह उनसे लिपट गई।

उनका गिफ्ट देने का तरीका भी अजीब हुआ करता है।सब कुछ चुपचाप और अचानक!! खुद के पास पुरानी स्विफ्ट कार है और मेरे लिए और भी महंगी खरीद लाए।

5 साल की शादीशुदा जिंदगी में इस आदमी ने न जाने कितने गिफ्ट दिए। गिनती करती हूँ तो थक जाती हूँ। ईमानदार है रिश्वत नहीं लेते । मग़र गिफ्ट देने के लिए कभी संकोच नहीं करते। कही से कैसे भी करके पैसे का इंतज़ाम कर लेते है।

लम्बी सी झप्पी के बाद मैं अलग हुई तो गाडी का निरीक्षण करने लगी। मेरा पसन्दीदा कलर था। बहुत सुंदर थी। फिर नजर उस जगह गई जहाँ मेरी स्कूटी खड़ी रहती थी।

वो अपनी जगह पैर नहीं थी। “स्कूटी कहाँ है?” मैंने चिल्लाकर पूछा।

“बेच दी मैंने, क्या करना अब उस जुगाड़ का? पार्किंग में इतनी जगह भी नही है।”

“मुझ से बिना पूछे बेच दी तुमने??”

“एक स्कूटी ही तो थी; पुरानी सी। गुस्सा क्यूँ होती हो?”

उन्होंने भावहीन स्वर में कहा तो मैं चिल्ला पड़ी।


स्कूटी नहीं थी वो। मेरी जिंदगी थी। मेरी धड़कनें बसती थीं उसमें। मेरे पापा की इकलौती निशानी थी मेरे पास।

मैं तुम्हारे तोहफे का सम्मान करती हूँ मगर उस स्कूटी के कीमत पे नहीं। मुझे नहीं चाहिए तुम्हारी गाड़ी। आपने मेरी सबसे प्यारी चीज बेच दी। वो भी मुझसे बिना पूछे।

मैं रोने जैसी हो गई। मेरे रोने की आवाज सुनकर मेरी सास बाहर निकल आई। उन्होंने मेरे सर पर हाथ फेरा तो मेरी रुलाई और फूट पड़ी।

रो मत बेटा, मैंने तो इससे पहले ही कहा था।एक बार बहू से पूछ ले। मग़र बेटा बड़ा हो गया है। तहसीलदार है! माँ की बात कहाँ सुनेगा? मग़र तू रो मत। अब माँ ने उनकी और मुखातिब होकर कहा –और तू खड़ा-खड़ा अब क्या देख रहा है वापस ला स्कूटी को।

तहसीलदार साहब गर्दन झुकाकर आए मेरे पास।रोते हुए कभी नहीं देखा था मुझे पहले कभी। प्यार जो बेइन्तहा करते हैं।

याचना भरे स्वर में बोले–

“सॉरी यार! मुझे क्या पता था वो स्कूटी तेरे दिल के इतनी करीब है। मैंने तो कबाड़ी को बेचा है सिर्फ सात हजार में। वो मामूली पैसे भी मेरे किस काम के थे?
यूँ ही बेच दिया कि गाड़ी मिलने के बाद उसका क्या करोगी?

मैं तो तुम्हे ख़ुशी देना चाहता था आँसू नहीं। अभी जाकर लाता हूँ। ”
फिर वो स्कूटी लाने चले गए। मैं अपने कमरे में आकर बैठ गई। जड़वत सी।

पति का भी क्या दोष था। हाँ एक दो बार उन्होंने कहा था कि ऐसे बेच कर नई ले लो।
मैंने भी हँस कर कह दिया था कि नहीं यही ठीक है। लेकिन अचानक स्कूटी न देखकर मैं बहुत ज्यादा भावुक हो गई थी। होती भी कैसे नहीं।

वो स्कूटी नहीं “औकात” थी मेरे पापा की। हुआ यूँ –जब मैं कॉलेज में थी तब मेरे साथ में पढ़ने वाली एक लड़की नई स्कूटी लेकर कॉलेज आई थी।
सभी सहेलियाँ उसे बधाई दे रही थीं।

तब मैंने उससे पूछ लिया – “कितने की है?” उसने तपाक से जो उत्तर दिया उसने मेरी जान ही निकाल ली थी।

“कितने की भी हो? तेरी और तेरे —बाप की औकात— से बाहर की है।”

अचानक पैरों तले जैसे जमीन ही निकल गई थी।
सब लड़कियाँ वहाँ से चली गई थीं। मगर मैं वही बैठी रह गई। किसी ने मेरे हृदय का दर्द नहीं देखा था। मुझे कभी यह अहसास ही नहीं हुआ था
कि वे सब मुझे अपने से अलग “गरीब” समझती थीं। मगर उस दिन लगा कि मैं उनमें से नहीं हूँ।

घर आई तब भी अपनी उदासी छुपा नहीं पाई। माँ से लिपट कर रो पड़ी थी। माँ को बताया तो माँ ने बस इतना ही कहा –” छिछोरी लड़कियों पर ज्यादा ध्यान मत दे! पढ़ाई पर ध्यान दे!”

रात को पापा घर आए तब उनसे भी मैंने पूछ लिया –”पापा हम गरीब हैं क्या?”तब पापा ने सर पे हाथ फिराते हुए कहा था –

“हम गरीब नही हैं बिटिया, बस जरा सा हमारा वक़्त गरीब चल रहा है।”

फिर अगले दिन मैं कॉलेज नहीं गई। न जाने क्यों दिल नहीं था। शाम को पापा जल्दी ही घर आ गए थे। और जो लाए थे वो इतनी बड़ी खुशी थी मेरे लिए कि शब्दों में बयाँ नहीं कर सकती।

एक प्यारी सी सफ़ेद स्कूटी। तितली सी। सोन चिड़िया सी। नहीं, एक सफेद परी सी थी वो। मेरे सपनों की उड़ान। मेरी जान थी वो।

सच कहूँ तो उस रात मुझे नींद नहीं आई थी। मैंने पापा को कितनी बार थैंक्यू बोला मन मन में— ये ना सोचा , स्कूटी कहाँ से आई ? पैसे कहाँ से आए ये भी नहीं सोच सकी ज्यादा ख़ुशी में।

फिर दो दिन ममैंने स्कूटी चलानी सीखी।
साईकिल चलानी तो आती थी। स्कूटी भी चलानी सीख गई।

पाँच दिन बाद कॉलेज पहुँची।

अपने पापा की “औकात” के साथ। एक राजकुमारी की तरह।
जैसे अभी स्वर्णजड़ित रथ से उतरी हो। सच पूछो तो मेरी जिंदगी में वो दिन ख़ुशी का सबसे बड़ा दिन था। मेरे पापा मुझे कितना चाहते हैं सबको पता चल गया।

मग़र कुछ दिनों बाद एक सहेली ने बताया कि वो मेरे पापा के साइकिल रिक्शा पर बैठी थी।
तब मैंने कहा–
“नहीं यार, तुम किसी और के साइकिल रिक्शा पर बैठी हो। मेरे पापा का अपना टेम्पो है।”

मग़र अंदर ही अंदर मेरा दिमाग झनझना उठा था। क्या पापा ने मेरी स्कूटी के लिए टेम्पो बेच दिया था। और छः महीने से ऊपर हो गए। मुझे पता भी नहीं लगने दिया।

शाम को पापा घर आए तो मैंने उन्हें गौर से देखा। आज इतने दिनों बाद फुर्सत से देखा तो जान पाई कि वे काफी दुबले-पतले हो गए हैं। वरना घ्यान से देखने का वक़्त ही नहीं मिलता था।

रात को आते थे और सुबह अँधेरे ही चले जाते थे। टेम्पो भी दूर किसी दोस्त के घर खड़ा करके आते थे। कैसे पता चलता बेच दिया है। मैं दौड़ कर उनसे लिपट गई! बोली –

“पापा आपने ऐसा क्यूँ किया?”
बस इतना ही मुख से निकला। रोना जो आ गया था।

” तू मेरा ग़ुरूर है बिटिया, तेरी आँख में आँसू देखूँ तो मैं कैसा बाप?चिंता ना कर बेचा नहीं है। गिरवी रखा था। इसी महीने छुड़ा लूँगा।”

“आप दुनिया के बेस्ट पापा हो। बेस्ट से भी बेस्ट। पर आपने ये क्या किया? मैंने स्कूटी माँगी ही कब थी? क्यूँ किया आपने ऐसा? छः महीने से पैरों से सवारियां ढोई आपने। ओह पापा आपने कितनी तक़लीफ़ झेली मेरे लिए ? मैं पागल कुछ समझ ही नही पाई ।”

इतना कह कर मैं दहाड़े मार कर रोने लगी। फिर हम सब रोने लगे। मेरे दोनों छोटे भाई। मेरी मम्मी भी। पता नहीं कब तक रोते रहे ।

वो स्कूटी नहीं थी मेरे लिए। मेरे पापा के खून से सींचा हुआ उड़नखटोला था मेरा और उसे किसी कबाड़ी को बेच दिया।दुःख तो होगा ही।

अचानक मेरी तन्द्रा टूटी। एक जानी-पहचानी सी आवाज कानो में पड़ी। फट-फट-फट,, मेरा उड़नखटोला रूपी स्कूटी की आवाज़ थी।

मेरे पति देव यानी तहसीलदार साहब चलाकर ला रहे थे और चलाते हुए एकदम बुद्दू लग रहे थे। मगर प्यारे से । मुझे बेइन्तहा चाहने वाले मेरे राजकुमार ।।।।।

 

 

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