Gau Mata ki jhutan ka pratap

By | September 24, 2021

गौ माता का प्यार भरा गुड़

एक सुबह छुट्टी का दिन था। असल में मैंने छुट्टी ले रखी थी । ऑफिस से।

एक शादी में जो जाना था , गॉव का शादी थी कुछ खास रिश्तेदारी में।

सुबह मैं खाली था। सोचा सुबह की सैर कर आये।
तो मैं सैर करने के बहाने दो- तीन किलोमीटर दूर जा कर मैं गांव को जाने वाली सड़क के किनारे बैठ गया ताजी हवा और सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था , पास के खेतों में कुछ गाय चर रही थी।
तभी वहाँ एक बड़ी सी कार आकर रुकी।

उसमें से एक सज्जन व्यक्ति उतरे,अमीरी उसके लिबास और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे।
उम्र उनकी कोई 60 के आस पास होगी।

वे एक बैग ले कर मुझसे कुछ दूर सड़क के किनारे बनी मुंडेर पर बैठ गये, बैग में से पॉलिथीन निकाली।
और उसमें जो था सारा चबूतरे पर उंडेल दिया।

उसमे गुड़ भरा था, अब उन्होने अपनी मधुर आवाज में पास में ही खड़ी ओर बैठी गायो को बुलाया,

सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बाद बच्चे अपने मांबाप को घेर लेते हैं, कुछ गाय को गुड़ उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी, वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर गले पर हाथ फेर रहे थे।

कुछ ही देर में गाय सारा गुड़ खाकर चली गई,

इसके बाद जो हुआ वह लम्हा, मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुल सकता,

गायो के गुड़ खाने के बाद थोड़ा बहुत जमीन पर छोटे छोटे टुकड़े रह जाते है।
तो वह सज्जन उन टुकड़ो को उठाकर खाने लगे,

मैं यह देख कर अचंभित रह गया। पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाते रहे और अपनी कार की और चल पड़े।

मैं अपने आप को रोक नहीं पाया, और दौड़कर उनके पास गया।

मैंने कहा श्रीमानजी यदि आप अनुमति दे तो क्या मैं कुछ पूछ सकता हूंआपसे

उन्होंने प्यार भरी मुस्कान से मेरी तरफ देखा। जिसमे उनकी प्यार भरी अनुमति का अहसास हुआ।

तो मैंने उनसे पूछा। कि अभी मैंने आपको देखा। आप इतने अमीर होकर भी गौ माता का बचा गुड खा रहे थे।

अब उनके चेहरे पर अब हल्की सी मुस्कान आ गई। उन्होंने कार का दरवाजा वापिस बंद करा

और मेरे कंधे पर प्यार भरा हाथ रख वापिस वही आ के बैठ गए। और बोले बेटा ये जो तुम गुड़ के झूठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे , ये तुम्हे नहीं पता मेरे लिए क्या है । इनका स्वाद अतुल्य है ।
।।।।।।।।।।

मैं अक्सर यहाँ आता रहता हूं। इस गुड की मिठास का अहसास करता रहता हूं।

मैं अब और अधिक आश्चर्य चकित होने लगा। आखिर क्या ख़ास बात है इस गुड़ में।

वे खुद ही बताने लगे कि। ये बात आज से कोई 38 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 21 या 22 साल का था घर की परेशानियों व् कलह की वजह से मैं घर से भाग आया था, परन्तु दुर्
ट्रेन में कोई मेरा बैग चुरा ले गया। जिसमें मेरा सारा सामान और पैसे थे।

अब इस अंजान शहर में मेरा कोई अपना तो था नहीं , भीषण गर्मी में दो दिन भूखे इधर से उधर भटकता रहा, और शाम को जब भूख मुझे निगलने को आतुर थी।

तब इसी जगह मैं थक कर बैठा था कि एक सज्जन आये ऐसी ही एक गाय को गुड़ डालकर चले गए ,

यहाँ एक बरगद का पेड़ हुआ करता था ।
मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा कि गाय ने गुड़ की तरफ देखा और उठ कर वहां से चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़ सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया।

मेरी मरणासन्न आत्मा में मानो प्राण से आ गये।

मैं सारी रत उसी पेड़ की जड़ो में पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी,

मैं उठा और फिर से किसी काम की तलाश में चल पड़ा। फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, शाम को तक कर फिर उसी जगह निराश भुखा खाली हाथ लौटा आया।

शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही बरगद का पेड़, वही भूखा मै।

कुछ ही देर में मैंने देखा की वही कल वाले सज्जन आये और कुछ गुड़ गाय को डालकर फिर से चलते बने,

गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मैं अचंभित हो उठा। परन्तु मैं लाचार था सो आज फिर गुड खा लिया।

और वही सो गया, सुबह फिर से निकल गया काम तलाशने आखिर आज मुझे,एक ढ़ाबे पर काम मिल ही गया। कुछ दिन बाद मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो

मैंने पहला काम ये किया कि, 1 किलो गुड़ ख़रीदा और सीधा किसी दिव्य शक्ति के प्रेरित 7 km पैदल चलकर उसी बरगद के पेड़ के नीचे आ गया।

इधर उधर नज़र दौड़ाई तो वही गाय नजर आ गयी । मैंने सारा का सारा गुड़ उस गौ माता को डाल दिया, इस बार मैं यह देख कर अचंभित हो उठा कि गाय सारा गुड़ खा गई, जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने वो 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था।

मेरा हृदय चीत्कार कर उठा उस ममतामय स्वरुप की ममता देखकर,

मैं रोता रोता बापस ढ़ाबे पे पहुँचा,और बहुत सोचता रहा, फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी भी मिल गई, दिन पर दिन मैं उन्नति और तरक्की के करता गया।

बाद में शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की तीन फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया , मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका झूठा गुड़ रूपी प्रसाद खाता हूँ

मैं लाखो रूपए गौशालाओं में चंदा भी देता हूँ , परन्तु मुझे मन की शांति यही आकर मिलती हैं बेटा।

मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे,
फिर एकदम से बोले। समझ गये अब तो तुम

जी मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े,गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई ,

मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला

वापस चल पड़ा घर की और शादी में शिरकत करने।

आज मेरे मन में कुछ और ही चल रहा था। मैं बहुत हल्का महसूस कर रहा था।

सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था।

उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ मन व् आत्मा को भी मीठा कर गई थी।

अब मेरी इच्छा गौ माता के बारे में अधिक जानने की होने लगी।
फिर कुछ किताबें व् इन्टरनेट के माध्यम से जाना कि

गौ माता गोलोक की एक अमूल्य निधि है, जिसकी रचना भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप से की है।

ऋग्वेद में गौ को‘अदिति’ कहा गया है। ‘दिति’ नाम नाश का प्रतीक है और ‘अदिति’ अविनाशी अमृतत्व का नाम है। अत: गौ को ‘अदिति’ कहकर वेद ने अमृतत्व का प्रतीक बतलाया है

जय गौ माता की

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।।।।जय श्री कृष्णा।।।।

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