MIRACLE : Beggar-In-Childhood-Now-Owner-40-Crore-Company | कैसे बना बचपन में भीख मांगने वाला लड़का 40 करोड़ की कंपनी का मालिक

By | February 28, 2022

Beggar-In-Childhood-Now-Owner-40-Crore-Company | कैसे बना बचपन में भीख मांगने वाला लड़का 40 करोड़ की कंपनी का मालिक

Beggar-In-Childhood-Now-Owner-40-Crore-Company

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रेणुका आराध्य एक ऐसी हस्ती है। जिसने अपना बचपन भीख मांग कर गुजारा लेकिन आज वह व्यक्ति अपनी मेहनत और लगन के दम पर 40 करोड़ की कंपनी के Proud Owner है. रेणुका आराध्य जी आज ‘Pravasi Cabs Private Limited’ के proud Owner है. साथ ही वे 3 start-up के director भी है.आज 1000 आदमी उनकी कंपनी में काम करते है

रेणुका आराध्य जी (Renuka Aradhya) का जन्म बेंगलुरू के समीप एक छोटे से गाँव गोपासंद्र में हुआ था. उनके पिता राज्य सरकार के द्वारा संचालित एक छोटे से स्थानीय मंदिर में पुजारी का कार्य करते थे. किन्तु इससे उन्हें कोई ज्यादा Income नहीं थी । घर का खर्च बड़ी मुश्किल से चलता था।

मंदिर में जो चढ़ावा आता था वो घर खर्च के लिए बहुत कम था ,क्योंकि मंदिर छोटे से गांव में था इसलिए ज्यादा लोग भी मंदिर में नहीं आते थे। शाम को या कभी कभी दिन में इनके पिता जी घरो में जाके आटा, चावल या पैसो की सहायता प्राप्त करते थे। जिसे हम एक तरह से भिक्षा भी कह सकते है। रेणुका जी भी कभी कभी अपने पिता के साथ जाते थे।

भिक्षा में लोग उन्हें जो भी आटा, ज्वार चावल दिया करते थे। उसमे से कुछ घर के लिए रख कर बाकि अनाज को बेच कर जो पैसा मिलता था, उससे घर खर्च में use करते थे।

चर्मरोगी की सेवा का काम

क्योंकि उनके परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी। तो जब रेणुका जी लगभग 11-12 साल के हुए तब उनके पिताजी को पता लगा की किसी बुजुर्ग चर्म रोगी को अपनी देखभाल के लिए ,किसी Care taker की आवश्यकता है। तो उनके पिताजी ने उन्हें ही उसकी सेवा कार्य में लगवा दिया जिससे परिवार की आर्थिक मदद हो सके।

रेणुका को उस बुजुर्ग को नहलाना धुलाना और उसकी अन्य जरूरतों का घ्यान रखना होता था।

पुजारी परिवार से ताल्लुक रखने के कारण उस घर में पूजा-पाठ की जिम्मेदारी भी उन पर डाल दी गई. उन्होंने उस रोगी की सेवा के साथ साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी और स्कूल भी जाते रहे।वापिस घर आकर उस रोगी की देखभाल में जुट जाते थे। इस तरह लगभग एक साल तक काम किया।

एक वर्ष के बाद उनके पिता ने उन्हें एक वेद आश्रम में डाल दिया. आश्रम में उन्हें बस दो वक्त का भोजन मिलता था, एक सुबह 8 बजे और दूसरा रात को 8 बजे. दिन में लम्बे समय तक भूखे रहने के कारण उनका दिमाग हर समय खाने की और लगा रहता था और वे पढ़ाई पर ध्यान नहीं दे पाते थे.

आश्रम में वेद और संस्कृत का अध्ययन अनिवार्य था. अपने seniors को नामकरण, विवाह और अन्य कार्यक्रमों में पूजा-पाठ हेतु जाता देख रेणुका वेद और संस्कृत ध्यान से पढ़ने लगे, ताकि उनके साथ पूजा-पाठ में जा सके और वहाँ जाकर भरपेट भोजन कर सके.

लेकिन इसके लिए उन्हें अपने seniors की बहुत request की और उनके कपड़े धोने का प्रस्ताव रखने के बाद वे रेणुका को अपने साथ ले जाने के लिये राजी हुए. इस तरह उनकी भोजन की समस्या का हल हो गया, लेकिन अधिकांश समय seniors का काम करते रहने के कारण वे ठीक से पढ़ नहीं पाते थे।

परिणामस्वरूप 10 वीं कक्षा में वे फेल हो गए. इस बीच उनके पिता का भी स्वर्गवास हो गया. ऐसी परिस्थिति में माँ और भाई-बहनों की जिम्मेदारी उनके कन्धों पर आ गई. अतः पढ़ाई छोड़ वे घर वापस आ गए और काम की तलाश करने लगे.

सबसे पहले उन्हें एक mechanical factory में helper का काम मिला. एक वर्ष वहाँ काम करने के उपरांत वे एक plastic बनाने वाली एक कंपनी में काम करने लगे, फिर एक ice making company में काम किया।

उसके बाद उन्हें कैमरा कंपनी adlab में साफ़ सफाई का काम मिला. दिमाग तेज होने की वजह से उन्होंने वहाँ रहते हुए printing का काम भी सीख लिया. वहाँ वे तीन वर्ष तक कार्य करते रहे. लेकिन वहाँ के कुछ कर्मचारी उन्हें अपने साथ संदिग्ध गतिविधियों में घसीटना चाहते थे, इसलिए उन्होंने वह नौकरी छोड़ दी.

उसके बाद उन्होंने श्याम सुन्दर ट्रेडिंग कंपनी में काम करना प्रारंभ कर दिया. वह सूटकेस, वैनिटी बैग, एयर बैग आदि बेचने वाली कंपनी थी. रेणुका ने उस कंपनी में भी helper की हैसियत से शुरूवात की, लेकिन अपनी मेहनत और लगन के बलबूते salesman की position तक पहुँच गए.

वे स्वयं का कोई business शुरू करना चाहते थे. अतः कुछ पूँजी लगाकर उन्होंने सूटकेस और vanity बैग के कवर बनाने का व्यवसाय प्रारंभ किया. वे सुबह-सुबह अपनी साइकिल पर निकल पड़ते और घर-घर जाकर सूटकेस और वैनिटी बैग के कवर सीते. लेकिन उनका ये प्रयास सफल नहीं हो पाया और उनका पूरा पैसा डूब गया. अब वे फिर खाली हाथ हो चुके थे.

ऐसे में उनके बड़े भाई ने उन्हें एक जगह 600 रुपये के वेतन पर security guard के काम पर लगवा दिया. इस कार्य को करते हुए ही 20 वर्ष की आयु में रेणुका ने विवाह कर लिया. उनका मानना था कि शादी उन्हें और जिम्मेदार बना देगी.

Security guard के रूप में मिलने वाला वेतन घर चलाने के लिये  पर्याप्त नहीं था. इसलिए रेणुका की पत्नी भी एक गारमेंट फैक्ट्री में काम करने लगी. साथ ही अतिरिक्त आमदनी के लिए रेणुका स्वयं नारियल के पेड़ पर चढ़कर नारियल तोड़ने और उसकी देखभाल करने का काम करने लगे.

कुछ बेहतर कर गुजरने की ललक उनमें अब भी कायम थी. इसलिए एक दिन उन्होंने सब कुछ छोड़ Driver बनने का फैसला कर लिया. लेकिन उनकी जेब में न तो licence बनाने के पैसे थे, न ही ड्राइविंग सीखने के. तब उन्होंने अपनी शादी की अंगूठी बेचकर और पत्नि के भाई से कुछ रूपये उधार लेकर licence बनवाने के लिए पैसे जुटाये.

licence बनवाने और ड्राइविंग सीखने के बाद जब उन्हें पहला ड्राइवर का जॉब मिला, तो पहले ही दिन उनके हाथों एक्सीडेंट हो गया और उन्हें नौकरी से बेदखल कर दिया गया. अपने एक अहम फैसले की ये दुर्गति देख वे बेहद निराश हो गए. उन्हें लगने लगा कि अब कोई उन्हें ड्राइवर के काम पर नहीं रखेगा.

लेकिन एक सज्जन व्यक्ति सतीश शेट्टी ने उन पर भरोसा जताया और अपनी ट्रेवल एजेंसी में उन्हें काम दिया. उन्होंने उनमें आत्मविश्वास का संचार भी किया. रेणुका पूरी मेहनत से वहाँ काम करने लगे. वे ठान चुके थे कि वे एक अच्छे ड्राइवर बनकर रहेंगे.

वे अपनी ड्राइविंग पर मेहनत करते, अपने हर customer का पूरा ध्यान रखते और उन्हें अच्छी से अच्छी service देने की कोशिश किया करते. धीरे-धीरे customers का उन पर भरोसा बढ़ता गया. उसके बाद उन्होंने अपनी जिंदगी में कभी पलटकर नहीं देखा.

Dead body के transportation का काम

कुछ वर्षों के बाद उन्हें नेहरु ट्रेवल्स में काम करने का अवसर प्राप्त हुआ, जो dead body के transportation के लिए मशहूर था. रेणुका ने इस अवसर को भी हाथों-हाथ लिया.

उनकी सोच थी कि यदि जीवन में आगे बढ़ना है, तो कोई भी अवसर हाथ से जाने मत दो और जो भी काम हाथ में लो, उसे पूरी लगन और निष्ठा से करो. पूरी निष्ठा से उन्होंने यह कार्य किया और 4 साल वहाँ काम करने के दौरान 200-300 dead body का पूरे भारत में transportation किया.

उसके बाद में वे दूसरी ट्रेवल एजेंसी में काम करने लगे, जहाँ उन्हें विदेशी पर्यटकों को tour पर ले जाने का अवसर प्राप्त हुआ. विदेशी पर्यटक उन्हें डॉलर में टिप दिया करते थे.

रेणुका इन पैसों को जमा करने लगे और इन्हीं जमा पैसों से तथा कुछ अपनी पत्नी के P.F के पैसों से उन्होंने कुछ लोगों को साथ लेकर 2001 में ‘CITY SAFARI’ नाम की कंपनी खोल ली.

यह कंपनी अच्छी चलने लगी और वे इसके manager बन गए. लेकिन रेणुका जी के सपने बड़े थे.

उन्होंने बैंक से लोन लेकर अपनी खुद की इंडिका खरीदी. फिर डेढ़ वर्ष के भीतर अपनी दूसरी गाड़ी भी ले ली. दो वर्षों तक वे स्पॉट सिटी टैक्सी का काम करते रहे. वे धीरे-धीरे अपनी गाड़ियों की संख्या में बढ़ोत्तरी भी करते जा रहे थे.

‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ की स्थापना

2006 तक उनके पास 5 गाड़ियाँ हो चुकी थी, जिन्हें वे अपने भाई और अन्य ड्राइवर्स की मदद से चलाते थे. इसी वर्ष एक अवसर ने फिर से उनका दरवाजा खटखटाया. उन्हें यह जानकारी मिली कि ‘इंडियन सिटी टैक्सी’ अपनी कंपनी बेच रही.

अवसर को भांप कर उन्होंने अपनी ज़िन्दगी का सबसे बड़ा जोखिम उठाते हुए अपनी सारी गाड़ियाँ बेच दी और मार्केट से कुछ उधार लेकर उस कंपनी को खरीद लिया.

उस कंपनी का नाम उन्होंने ‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ रखा. यह कदम उनके लिए मील का पत्थर साबित हुआ. इस कदम के साथ ही व्यवसायी के तौर पर उनके एक नए सफ़र का आगाज़ हुआ.

कॉर्पोरेटके लिए काम

नई कंपनी में उन्होंने सिटी टैक्सी का काम पूर्णतः बंद कर दिया और कॉर्पोरेट को अपनी गाड़ी देने लगे. कॉर्पोरेट को गाड़ी देने के कई लाभ थे. एक तो ये उनके लिए एक बड़ा challenge था, फिर इसमें उन्हें बहुत कुछ सीखने को मिला और साथ ही उनकी कंपनी को एक बड़ा exposure मिला.

सबसे पहले उन्होंने Amazon India के लिए काम करना शुरू किया. उस समय उनकी कंपनी में 15 members और 4 गाड़ियाँ थी. Amazon India ने भारत में बहुत तेजी से प्रगति की और साथ ‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ ने भी.

कुछ ही वर्षों में उनकी गाड़ियाँ 4 से 300 हो गई. बंगलुरू के बाद उन्होंने उसके चेन्नई में भी अपनी branch शुरू कर दी. वहाँ उनकी 275 गाड़ियां चलती है.

शुरू में वे Amazon  India से ही जुड़े रहे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी कंपनी के काम का expansion प्रारंभ किया. जिसमें कई नामी गिरामी companies जैसे Google, Walmart, C-gates, General Motors आदि उनकी client बनी.

उनकी कंपनी अपने ग्राहकों के समय, संतुष्टि और आराम का पूरा ध्यान रखती है, ताकि उनका विश्वास बनाये रख सके. इसलिए आज उनकी कंपनी का इतना मजबूत customer base है कि जहाँ कई कम्पनियाँ Ola और Uber जैसी नई कंपनियों के मार्केट में आने के बाद धराशायी हो गई, वहीँ ‘प्रवासी कैब्स प्राइवेट लिमिटेड’ मजबूती से आगे बढ़ती रही.

आज उनकी कंपनी में 1000 लोग काम करते है और उसका टर्न ओवर 40 करोड़ का है. साथ ही वे 3 start-up के director भी है.

दोस्तों, कौन सोच सकता था कि बचपन में भीख मांगने वाला लड़का, जो 10 वीं में फेल हो गया था और जिसके पास एक फूटी कौड़ी नहीं थी, कभी 40 करोड़ की कंपनी का मालिक होगा. लेकिन रेणुका आराध्य ने ये साबित कर दिखाया कि परिस्थितियां चाहे कितनी ही विकट क्यों न हो, यदि आपमें कुछ गुजरने की ख्वाहिश है, तो इस दुनिया में कुछ भी हासिल किया जा सकता है, बशर्ते आप उसे पाने के सपने देखें, सही योजना बनाये और उसे हासिल करने के लिए कड़ी मेहनत करें.

हमारा इस आर्टिकल बहुत सी जिन्दगियो को बदल देगा , शायद आपकी भी ,ऐसी हम उम्मीद करते है

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